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“चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों”…..

लगता है फ़िल्म ‘गुमराह’ में साहिर लुधियानवी की लिखी इन पंक्तियों को हमारी जांच एजेंसियों ने कुछ ज्यादा ही दिल पर ले लिया है। मैच फिक्सिंग घोटाले की जांच रही हो या फिर सुशांत सिंह राजपूत केस अथवा फ़िल्मी सितारों के ड्रग्स कनेक्शन का मामला हो या रिया से ‘जुड़े’ क्रॉस कनेक्शन…..पिछले तीन दशक में करीबन ऐसे असंख्य हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए जिसके अंजाम की घोषणा एक आम भारतीय पहले ही कर देता है कि ..”इस जांच वगैरह में कुछ कुछ होनेवाला नहीं है, बस कुछ दिनों की हाय-तौबा होगी…और कुछ दिन बाद सब शांत हो जाएगा” और…… अमूमन होता भी यही है। ढीले होते-होते ये मामले इस कदर कछुआ चाल हो जाते हैं कि आम जनता से लेकर मीडिया तक किसी को कुछ याद ही नहीं रहता। सब भूलते हैं या भूलने के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। तब यह वाक्य अपने आप को प्रमाणित करता है कि “पब्लिक मेमरी इज वेरी शार्ट”। 

     इसका यह कतई मतलब मत निकालिए कि जांच अधिकारी कहीं ढीले पड़ते हैं या उन्हें आगे बढ़ना नहीं आता…असल में होता ये है कि उनके हाथ ‘दबाव’ नामक अदृश्य शक्ति से ऐसे जकड़ और अकड़ दिए जाते हैं कि वे चाहते हुए भी विवश हो जाते हैं। कुछ व्यवस्था के आगे तनकर खड़े भी होते हैं लेकिन इन सब का ह्रास बेहद दुखद रहा है। ‘द स्कैम’ नाम वेब सीरिज के कारण फिर से सुर्खियों में आए हर्षद मेहता कांड के जांच अधिकारी आर. माधवन के साथ क्या हुआ यह सभी ने देखा लेकिन क्या किसी ने जानने की कोशिश की कि जांच से हटाए जाने और सीबीआई चीफ के मुंह पर इस्तीफा मारनेवाले इस ‘अपराइट’ अधिकारी के साथ आगे क्या हुआ? गुमनाम हो चुके माधवन को डेढ़ दशक बाद बीसीसीआई ने जरूर मैच फिक्सिंग का पर्दाफाश करने के लिए याद किया लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इतने अर्से बाद भी उन्हें फिर एक बार जलील होना पड़ा। उन्होंने जांचकर महान कप्तान सहित सात दागी खिलाड़ियों के नाम भी दे दिए लेकिन विडंबना देखिए कि आज तक सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा वह लिफाफा आज तक नहीं खोला गया। लगे हाथों यह भी बता दूं कि इसी कोरोनाकाल में माधवन इन सबसे दुखी होकर दुनिया छोड़ चले गए, लेकिन किसी ने इस खबर की दो पंक्तियों में लायक भी उन्हें नहीं माना। इसीलिए तो अक्सर जांच अधिकारी भी मान लेते हैं कि ‘वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन….उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।’

पिछले हप्ते बिहार सहित हर मंच पर खूब धोबीपछाड दाव चले। सबसे ज्यादा भद्द तो टीवी वालों के आकलन और उनके एग्जिट पोल की उड़ी लेकिन मानना पड़ेगा कि उनकी ढीठता ने कुछ दिखने नहीं दिया। सताधारकों को खुश करने के लिए लगभग सभी चैनलों ने चुनाव की घोषणा से पहले एक स्वर में एनडीए की एकतरफा जीत घोषित कर नमक की कीमत अदा कर दी थी। लेकिन जब एग्जिट पोल में जमीनी स्तर पर सच्चाई जानी तो फिर भेड़चाल में पाला बदलते हुए गलाफाड चिल्लाने लगे कि तेजस्वी का CM बनना तय है। मतगणना के दिन दोपहर तक उनका वही स्वर बरकरार था लेकिन इसके बाद मतगणनाकर्मियों, जिलाधिकारी से लेकर रिटर्निंग ऑफिसर तक के जो सुर बदले तो मीडियाकर्मी कहां पीछे रहते। दौड़ में निरंतर आगे रहकर विनिंग पोस्ट छूने की तैयारी कर चुके तेजस्वी को एकाएक किसी अदृश्य शक्ति ने ‘रोका’ और दूसरे धड़ाधड़ आगे निकलते गए। हप्ते भर से CM पद की शपथ की रिहर्सल कर रहे लालूपुत्र अभी तक इस सदमे से गाफिल हैं।

बिहार में तेजस्वी की तरह एक और पूर्व IPL खिलाड़ी (चिराग पासवान) भी औंधे मुंह गिरा और वह अभी तक हक्का-बक्का है। ये चिराग यही ना जान सका कि उसकी रोशनी पिता की आत्मा के साथ ही फना हो चुकी है। किसी का मोहरा बनकर सुशासन को घेरने में योगदान तो दे दिया लेकिन इस प्रक्रिया में अपनी जमीन खोकर उन्होंने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। उन्हें ये नहीं पता कि जिसका खूंटा मजबूत ना हो उसे अवसरवादी राजनीतिज्ञ लोग पतंग बना देते हैं। लेकिन चिराग तो पिता के असमय मौत के बाद ‘कटी पतंग’ हो गए हैं। बबुआ इस सच्चाई को मान लो कि पिता की जागिर के बूते केंद्र में मंत्री पद नहीं मिलना, क्योंकि राजनीति में यही चलता है कि “वादे हैं, वादों का क्या ?” उधर बीजेपी ने नीतीश को शपथ ग्रहण के फकत एक घंटे के भीतर घुटने पर ला दिया। JDU के मंत्री को करप्ट साबितकर इस्तीफे का अल्टीमेटम सुशासन बाबू के लिए 440 वोल्ट का झटका था और वे खीस निपोरकर हुक्म की तामिल करने को मजबूर हो गए।

चलते-चलाते

मुंबई मनपा का अगला चुनाव सताधारकों के लिए वाटरलू ही साबित होनेवाला है। एक तरफ बीजेपी ने सभी 227 सीटों पर अकेले ताल ठोकने की घोषणा की तो “महायुति में तालमेल” बनाकर चुनाव लड़ने की शिवसेना की मंशा में कांग्रेस ने अभी से ही यह कहकर पलीता लगा दिया कि ‘हम तो भाई अकेले के बूते और सभी सीटों पर लड़ेंगे।’’ मनपा में पार्टी नेता रवि राजा की इस घोषणा से सेना और एनसीपी दोनों सकते में है।

-सतीश मिश्र (पूर्व सह-संपादक, नवभारत टाइम्स)

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