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अर्धसैनिकों का पूर्ण सत्य

कुछ दिन पहले कश्मीर में सुरक्षाबल के जवानों के साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई बदसलूकी को सेना पर सरकारी अंकुश का नतीजा कहना या नक्सली हमले में मारे गए को सैनिकों का दुरुपयोग सुनकर दुख होता है कि आम जनता सैनिक और अर्धसैनिकों के इस भेद को कब जान पाएगी? जिस तरह देश और विदेश में यह भ्रम पूर्ण सत्य की शक्ल अख्तियार कर चुका है कि ‘भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है’ वही हाल सेना और अन्य को लेकर व्याप्त है। नेता, शिक्षित, टीचर, मीडिया या तथाकथित बुद्धजीवी सभी एक शब्द में सभी हरे वर्दीधारी को सैनिक कहकर उन अर्धसैनिक बल के जवानों को पीड़ा पहुंचाते हैं जिन्हें जान जाने के साथ ही साथ अपनी पहचान खोने का भी डर हमेशा सताता रहता है।

क्या यह अजीब सा नहीं लगता जब एक कंपनी के श्रेय या दोष के लिए पूरे उद्योग जगत को ज़िम्मेदार ठहराया जाए? आज सेना के मुक़ाबले 70% अधिक संख्या और तैनाती के बावजूद अर्धसैनिक बल आम देशवासियों के सामने इसी तरह अपने अस्तित्व और अधिकार के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। जब भी जवान शहीद होता है मीडिया उन सबको ‘भारतीय सेना का जवान शहीद हुआ’ करार दे देती है। वास्तव में अधिकांश इससे अनभिज्ञ हैं कि अर्धसैनिक बल कौन सी बला है? आम जनता इस गफलत को नहीं जानती लेकिन सरकार तो यह सब जानते हुए भी इन बलों के सैनिकों के साथ यह भेदभाव कर रही है। इनके वेतन-भत्तों एवं अन्य सुविधाओं में भारी भेदभाव है। सरकारी फाइलों में देश के लिए जान देने वाले थल सेना के जवानों को ‘शहीद’ और अर्धसैनिक जवानों को ‘मृतक’ कहा जाता है।

हमारे देश की सीमाओं की वास्तविक सुरक्षा में जो दिन रात तैनात हैं (जिनको लेकर सोशल मीडिया पर मेसेज चलते रहते हैं कि ‘वो जाग रहे हैं, इसलिए हम सो पा रहे हैं’) वे वास्तव में थल सेना के सैनिक नहीं बल्कि सीमा सुरक्षा बल BSF/ITBP/SSB/AR जैसी इकाइयों के जवान हैं। सेना तो इनकी पोस्टों से काफी पीछे रहती है जबकि दुश्मन की पहली गोली का सामना इन इकाइयों के जवान की छाती ही करती है। भारत की सीमा छह देशों के साथ लगी हुई है। इसमें से BSF के जवान पाकिस्तान (411 कंपनी) और बांग्लादेश (480) की सीमा की रक्षा पर तैनात हैं जबकि इंडो-तिब्बत सीमा बल (ITBP) के जवान (136) चीन की सीमा, सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 162 कंपनी नेपाल व 97 कंपनी भूटान सीमा पर तैनात है। असम राफल्स (AR) की 60 कंपनी म्यांमार सीमा पर है। समझ में नहीं आता कि जब दुश्मन की गोली इनमें कोई भेदभाव नहीं रखती तो भारत सरकार ऐसा क्यों कर रही है। कई मामलों में इन बलों का काम सेना से भी अधिक कठिन और दुष्कर होता है।

कनफ्यूजन के दूसरे शिकार होते हैं केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के जवान। उत्तर-पूर्व के राज्य हों या नक्सल समस्या से ग्रसित मध्य भारत के राज्य अथवा जम्मू-कश्मीर, हर ओर CRPF के जवान ही तैनात किए जाते हैं। सुकमा के नक्सली हमले में जब 29 जवान शहीद हुए तो पूरे देश ने सेना का जवान शहीद हुआ कहकर मातमपुर्सी की, जबकि सेना की कोई भी टुकड़ी नक्सल प्रभावित राज्यों में तैनात नहीं है। CRPF संसद और VVIP के अलावा राम जन्मभूमि मंदिर, कृष्ण जन्म भूमि मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर आदि की भी सुरक्षा करती है। OROP पर असहमति का एक सबसे बड़ा कारण तो यही है। OROP में भी इन जवानों अलग-अलग श्रेणियों में रखकर ऊंच-नीच बताया गया है। सीमा पर कुछ मीटर आगे-पीछे तैनाती होने पर क्या मेहनताने और सुविधाओं में इतना बड़ा फर्क होना चाहिए? नंगी सच्चाई है कि सेना में जवानों को OROP निर्धारण और पुराने स्केल के मुताबिक पेंशन, अधिक वेतन, सभी को 100% फैमिली क्वार्टर, कैंटीन की बेहतरीन सुविधा, लगभग सभी ट्रेनों में स्पेशल कोच, आर्मी स्पेशल वेतन, साल के दौरान समय पर व लंबी छुट्टियां मिलती हैं जबकि अर्धसैनिक बलों इनमें से कोई भी सुविधा नहीं मिलती। आज जरूरत यह फासला मिटाने की है।

चलते-चलाते

अर्धसैनिकों का ‘उपयोग’ तो देश में प्रहसन का विषय बन चुका है। कुछ साल पहले हद तो तब हुई जब सैफई महोत्सव के लिए CRPF की कंपनियां लगा दी गईं। इन बलों के DG के पास नेता जी के पोते की शादी में फलां-फलां वक्त BSF, CRPF, ITBP की कंपनियां लगाने की मांग का आना साधारण बात है। वैसे एक मामले में थलसेना और अर्धसैनिक बल के जवान बराबर हैं, वह है उच्चाधिकारियों द्वारा उनसे नौकर से भी बदतर काम करवाना। साहब के बंगले में माली का काम करने से लेकर सब्जी लाना और बच्चों को स्कूल छोड़ना, सब जगह एक जैसा ही है।

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